धर्मपत्नी सेवा (हास्य काव्य) – डॉ अनमोल कुमार

सुबह-सुबह उठकर पहले चाय बनानी पड़े,

“कड़क बनाना” का ऑर्डर रोज़ आनी पड़े।

 

ब्रेकफास्ट में पराठा, लंच में दाल-चावल,

डिनर में पूछो “क्या खाओगी?” तो बोले “कुछ हल्का-फुल्का”।

 

बाजार का बैग उठाओ, सब्जी-फल लाओ,

“ये टमाटर महंगे क्यों?” का ज्ञान भी पेल जाओ।

 

रिमोट का कंट्रोल, टीवी का चैनल,

“मेरा सीरियल” है, बाकी सब बेकार है जनाब।

 

कपड़े धोना, बर्तन मांजना, घर की सफाई,

ऊपर से सुनना पड़े – “करते क्या हो दिन भर, थकाई?”

 

फिर भी मुस्कुरा कर बोलूं “जी हुकुम मैडम”,

क्योंकि धर्मपत्नी की सेवा ही सबसे बड़ा पुण्य-कर्म।

 

पत्नी खुश तो भगवान खुश, घर में शांति छाई,

इसीलिए भैया, रोज़ करो धर्मपत्नी की अगवानी।

और हां गलती से भी “तुम तो…” मत बोलना,

वरना 1 महीने का उपवास पक्का हो जाना!

– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा जिला पटना बिहार

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