ग़ज़ल (हिंदी) – जसवीर सिंह हलधर

आग फैली है फिज़ाओं में हवा कैसे बहे ।

देवता घायल पड़े शैतानियत के कहकहे ।

 

आदमीयत रो रही आतंक के इस दौर में ,

राजनेता कर रहे इस बात पर भी चहचहे ।

 

गैर देते बद्दुआ तो तल्ख़ मैं होता नहीं ,

घाव अपनों के दिए जो आज तक मैंने सहे ।

 

चूर हैं सारे इरादे औ ज़िगर नाशाद है ,

जिंदगी का कारवां घायल बशर कैसे गहे ।

 

सिर्फ़ शब्दों के पुलंदे दिख रहे साहित्य में ,

छंद के आवास पर छलछंद के टीले ढहे ।

 

मज़हबी आगोश में कुछ लोग पत्थर हो गए ,

कौन है ऐसा मसीहा जो इन्हें आकर तहे ।

 

मुद्दतों की तिशनगी तो मयकदे में कैद है ,

दिल ज़िगर सूखे हुए तो कौन से घर में रहे ।

 

यार ने धोखा दिया तो जग गई दीवानगी ,

रोज पीना छोड़ ‘हलधर’ डांटकर साकी कहे ।

– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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