गीत भी गाना है अश्क भी छुपाना है।
पास तेरे अब आकर,राज़ सब बताना है।
दर्द हाय बढ़ता है,अब सहा नही जाता,
चैन भी नही मिलता, दर्द सब सुनाना है।
खो ग़ये थे ग़फ़लत मे,भूल बैठे सब अपना,
साथ अब नही छूँटे,जुल्मी ये जमाना है।
दिल ने तुमको चाहा है वस्ल ही हकीकत है,
लोक लाज की रस्मों से तुमको बचाना है।
मौत भी सदा डरती, पास वो नही आती,
सोच लो जरा,ऋतु तुम मौत को झुकाना है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़
