ग़ज़ल – डॉ0 अशोक गुलशन

कभी बैठकर कभी लेटकर चलकर रोये बाबू जी,

घर की छत पर बैठ अकेले जमकर रोये बाबू जी।

 

अपनों का व्यवहार बुढ़ापे में ग़ैरों सा लगता है,

इसी बात को मन ही मन में कहकर रोये बाबू जी।

 

नाती – पोते बीबी – बच्चे जब – जब उनसे दूर हुये,

अश्क़ों के गहरे सागर में बहकर रोये बाबू जी।

 

शक्तिहीन हो गये और जब अपनों ने ठुकराया तो,

पीड़ा और घुटन को तब – तब सहकर रोये बाबू जी।

 

हरदम हँसते रहते थे वो किन्तु कभी जब रोये तो,

सबसे अपनी आँख बचाकर छुपकर रोये बाबू जी।

 

तन्हाई में ‘गुलशन ‘ की जब याद बहुत ही आयी तो,

याद – याद में रोते – रोते थककर रोये बाबू जी।

-डॉ0 अशोक गुलशन उत्तरी कानूनगोपुरा,

बहराइच, उत्तर प्रदेश

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