उपन्यास सम्राट प्रेमचंद – श्री ठाकुर

कुछ नाम समय की धूल में नहीं खोते,

वे युगों की चेतना बनकर जीवित रहते हैं।

प्रेमचंद ऐसा ही एक नाम हैं—

जिनकी लेखनी ने शब्द नहीं,

समाज की आत्मा लिखी।

 

उन्होंने महलों की नहीं,

झोपड़ियों की पीड़ा को स्वर दिया;

किसानों की सूखी हथेलियों में

संघर्ष का इतिहास पढ़ा,

और भूख से जूझते मनुष्य के चेहरे पर

मानवता का उजास खोज लिया।

 

उनकी कलम ने सिखाया कि

साहित्य केवल मनोरंजन नहीं,

समाज का दर्पण भी है

और परिवर्तन का संकल्प भी।

 

“गोदान” का होरी आज भी

हर उस किसान में साँस लेता है

जो श्रम करता है,

पर सम्मान की प्रतीक्षा में जीता है।

“ईदगाह” का हामिद आज भी

त्याग, प्रेम और संस्कार का

सबसे उज्ज्वल प्रतीक है।

 

प्रेमचंद,

आपने शब्दों को संवेदना दी,

संवेदना को विचार दिया,

और विचारों को अमरता।

 

आज आपकी जयंती पर

हम केवल स्मरण नहीं करते,

बल्कि यह संकल्प लेते हैं

कि हमारी लेखनी भी

सत्य, न्याय और मानवता की पक्षधर बनेगी।

 

आपकी रचनाएँ केवल पुस्तकें नहीं,

भारतीय समाज का जीवंत इतिहास हैं;

आप केवल एक लेखक नहीं,

एक युग, एक विचार और

एक अमर साहित्यिक चेतना हैं।

 

आपको शत-शत नमन।

“जब तक मनुष्य के हृदय में संवेदना जीवित रहेगी,

तब तक प्रेमचंद की लेखनी अमर रहेगी।”

– श्री ठाकुर देवघर (झारखण्ड)

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