अहंकार और आत्मसम्मान (आलेख) –

vivratidarpan.com – मनुष्य के व्यक्तित्व को उसके गुण, व्यवहार और संस्कार महान बनाते हैं, लेकिन जब उन्हीं गुणों में अहंकार का विष घुल जाता है, तब उनका कोई महत्व नहीं रह जाता। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह धीरे-धीरे उसकी अच्छाइयों, विनम्रता, रिश्तों और सफलता को समाप्त कर देता है। जिस व्यक्ति को अपने ज्ञान, धन, पद, शक्ति या प्रतिभा पर घमंड हो जाता है, वह स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझने लगता है। उसके मन में यह भावना जन्म लेने लगती है कि “मैं ही सब कुछ हूँ, मेरे जैसा कोई नहीं।” यही सोच उसके पतन का कारण बनती है। हमारे धर्मग्रंथों और पुराणों में भी अनेक उदाहरण मिलते हैं कि जब भगवान के प्रिय भक्तों या देवताओं को अपनी शक्ति पर अहंकार हो जाता था, तब स्वयं भगवान उनका अहंकार दूर करते थे। इसका उद्देश्य उन्हें दंड देना नहीं, बल्कि उन्हें विनम्र बनाकर सही मार्ग पर लाना होता था। भगवान भी नहीं चाहते कि उनके भक्त अहंकारी कहलाएँ, क्योंकि जहाँ अहंकार होता है, वहाँ भक्ति, प्रेम और सच्ची श्रद्धा टिक नहीं पाती।

वहीं दूसरी ओर आत्मसम्मान, अहंकार से बिल्कुल भिन्न है। आत्मसम्मान व्यक्ति को अपने अस्तित्व, अपने मूल्यों और अपने स्वाभिमान की रक्षा करना सिखाता है। आज के समय में कई लोग थोड़े से लाभ या पैसों के लिए अपना आत्मसम्मान भी त्याग देते हैं, जबकि यह उचित नहीं है। यदि हमारी गलती हो, तो विनम्रता से स्वीकार कर क्षमा माँगना महानता है; लेकिन यदि हमारी कोई गलती नहीं है, तो केवल किसी के दबाव या भय से झुक जाना आत्मसम्मान का अपमान है। आत्मसम्मान हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह हमें अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहना सिखाता है। इसके विपरीत अहंकार व्यक्ति को सीखने, समझने और आगे बढ़ने से रोक देता है। अहंकारी व्यक्ति दूसरों की सलाह को महत्व नहीं देता और अंततः अकेला पड़ जाता है।

इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर से अहंकार को दूर करके विनम्रता अपनानी चाहिए तथा आत्मसम्मान को सदैव बनाए रखना चाहिए। विनम्रता मनुष्य को महान बनाती है, जबकि आत्मसम्मान उसे सम्मानपूर्वक जीना सिखाता है। यही जीवन की वास्तविक सफलता और सच्ची पहचान है। और इसे ही हर मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए।

– डॉ. शिखा गोस्वामी “निहारिका”, मुंगेली, छत्तीसगढ़

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