चौंच भर प्यास –  प्रियंका सौरभ

  कोई पानी रख दे, कटोरे में भरकर, मैं भी जी लूं ज़रा, इस तपते शहर में। ना पुकार है मेरी किसी हैडलाइन में, ना नाम मेरा किसी एनजीओ के…

संसार से भागे फिरते हो – सविता सिंह

  क्यों मन मलिन तेरा सखे याद किसी की आई है? बैठे हो सरि के कूल पर या दिखती परछाई है। क्यों अचंभित हो गए तुम यह नूपुर नहीं मन…

रिश्तों का एटीएम: जब प्यार केवल ट्रांज़ैक्शन बन जाए – डॉ सत्यवान सौरभ

  Vivratidarpan.com – रिश्ते अब महज़ ज़रूरतों के एटीएम बनते जा रहे हैं। डिजिटल दुनिया ने संवाद को ‘रीचार्ज पैकेज’ और मुलाक़ातों को ‘होम-डिलीवरी’ में बदल दिया है। दिलचस्पी कम…

ग़ज़ल – रीता गुलाटी

  प्यार की समझो हकीकत दोस्तो, अब न करना तुम शिकायत दोस्तों।   प्यार समझो क्यो इबादत दोस्तों, जान लेवा है मुहब्बत दोस्तों।   प्यार करते है सनम हम आपसे,…

पूर्णिका (समय और मौका) – श्याम कुंवर भारती

  आज रोपा बीज कल निकले अंकुर और फलने फूलने लगे। ऐसा होता नहीं आज हुआ पैदा और कल चलने फिरने लगे।   समय पर होता हर काम ज्यादा डालो…

कैसे जीते यहां – डॉ आशीष मिश्र

  इश्क में लोग कैसे हैं जीते  यहां, हमने लोगों को मारते देखा यहां। प्यार है या कफन का उठता धुआ, ठहर जाती हैं सांसों की दुनिया जहां।। इश्क़ में…

गोदान से श्रेष्ठतर “रक्तदान” – डॉ. जयप्रकाश तिवारी

  गया था मैं मेडिकल वार्ड में जहां रोग विविध रोगी अनेक रोग भले हों, भांति भांति के मांग है ‘रक्त की बोतल’ एक   देखा था टपकते बोतल से…

पिता – श्रीमती निहारिका

पिता हमेशा तप करता है, कड़ी धूप में काम वो करता, राह कंटीली वो चलता है, श्रम की भट्टी में वह जलता, बच्चे को दे शीतल छाया, कर्म मार्ग पर…

सांस्कृतिक मेलों के अस्तित्व पर संकट – डॉ. सुधाकर आशावादी

vivratidarpan.com – भारत बहुसंस्कृति वाला देश है। पर्वों की अद्भुत श्रृंखला में भारत के कोने कोने में विशेष पर्व और मेले आयोजित होते रहते हैं। मेलों का एक निश्चित समय…

छटपटाता रहता हूँ मैं – गुरुदीन वर्मा

  नहीं छोड़ पाया मैं, अभी तक, अपनी इस आदत को, रात को जब, सो रही होती है दुनिया, मैं व्यस्त होता हूँ, अपने काम में, और डूबा रहता हूँ,…