पूर्णिका (समय और मौका) – श्याम कुंवर भारती

  आज रोपा बीज कल निकले अंकुर और फलने फूलने लगे। ऐसा होता नहीं आज हुआ पैदा और कल चलने फिरने लगे।   समय पर होता हर काम ज्यादा डालो…

कैसे जीते यहां – डॉ आशीष मिश्र

  इश्क में लोग कैसे हैं जीते  यहां, हमने लोगों को मारते देखा यहां। प्यार है या कफन का उठता धुआ, ठहर जाती हैं सांसों की दुनिया जहां।। इश्क़ में…

गोदान से श्रेष्ठतर “रक्तदान” – डॉ. जयप्रकाश तिवारी

  गया था मैं मेडिकल वार्ड में जहां रोग विविध रोगी अनेक रोग भले हों, भांति भांति के मांग है ‘रक्त की बोतल’ एक   देखा था टपकते बोतल से…

पिता – श्रीमती निहारिका

पिता हमेशा तप करता है, कड़ी धूप में काम वो करता, राह कंटीली वो चलता है, श्रम की भट्टी में वह जलता, बच्चे को दे शीतल छाया, कर्म मार्ग पर…

सांस्कृतिक मेलों के अस्तित्व पर संकट – डॉ. सुधाकर आशावादी

vivratidarpan.com – भारत बहुसंस्कृति वाला देश है। पर्वों की अद्भुत श्रृंखला में भारत के कोने कोने में विशेष पर्व और मेले आयोजित होते रहते हैं। मेलों का एक निश्चित समय…

छटपटाता रहता हूँ मैं – गुरुदीन वर्मा

  नहीं छोड़ पाया मैं, अभी तक, अपनी इस आदत को, रात को जब, सो रही होती है दुनिया, मैं व्यस्त होता हूँ, अपने काम में, और डूबा रहता हूँ,…

गजल – मधु शुक्ला

  सात्विक जीवन को अपनाना सबके बस की बात नहीं, सीमित साधन में मुस्काना सबके बस की बात नहीं।   पीछे धन के भागें जिन घर दौलत के भंडार भरे…

सपने सच होंगे – राजेश कुमार झा 

  सपने सच होंगे ।+ मंजिल तक पहुंच जाओगे।। अगर हौसला हो मजबूत। तो कुछ भी कर जाओगे ।। चलोगे सच्चाई की राह पर । जीवन में आपार खुशियां पाओगे…

सरकारी स्कूल की पीड़ा – प्रियंका सौरभ

  जहाँ दीवारें बोली थीं, “आओ, अक्षर की जोत जलाएँ,” जहाँ धूप में भी छाँव मिला करती थी मास्टर जी की टेढ़ी मुस्कान में— वहाँ अब सन्नाटा पसरा है, धूल…

शब्दों की शास्त्रीय यात्रा “शब्दिका” – विवेक रंजन श्रीवास्तव

vivratidarpan.com – हिंदी के काव्यशास्त्र के अनुसार कविता की मूल्यवत्ता ध्वनि, रस, अलंकार, वक्रोक्ति, औचित्य आदि तत्वों में निहित होती है, जबकि पश्चिमी आलोचना उसे भाव, संरचना, प्रतीकात्मकता, भाषा की प्रामाणिकता…