मानव का अधिकार कहाँ है? – अनिरुद्ध कुमार

वादों का बौछार यहाँ है। संसद में तकरार यहाँ है। भूख गरीबी छाती पीटे, हर कोई लाचार यहाँ है। मानव का अधिकार कहाँ है?   ऊंचा, नीचा  बोल रहें सब,…

भोजपुरी पूर्णिका – श्याम कुंवर भारती

सुने पतझड़ दिल में बन के बहार आ जइता । ना ना कईके जान अब त हमार हो जइता ।   बेचारा दिल मनाई त मनाई कइसे हम बोला। पियासल…

गोबर संवाद – प्रियंका सौरभ

कभी रिसर्च की चुप्पी में, दीवारों पर गोबर उतरा। तो कभी प्रतिरोध की गर्मी में, वही गोबर उल्टा फेरा।   मैडम बोलीं — ‘ये संस्कृति है’, छात्र बोले — ‘ये…

कभी न हो मंदा, चंदा उगाही का धंधा (व्यंग्य) – सुधाकर आशावादी

vivratidarpan.com –  समाज में अच्छे काम करने वालों की कमी नहीं है। देश का बुद्धिजीवी भले ही घर खर्च की चिंता न करे, मगर समाज की चिंता उसे लगी रहती…

कविता (जिहाद हो) – जसवीर सिंह हलधर

महा विकास के लिए , जिहाद हो जिहाद हो । नए प्रकाश के लिए,जिहाद हो जिहाद हो ।। जिहाद हो कि देश से, कुरीति का विनाश हो । जिहाद हो…

इंतज़ार – सविता सिंह मीरा

कभी जो गुजरो तुम उस गली से अब भी तुम्हें वो वही मिलेगी, सपन पले थे जो उन आँखों में अनिमेष दृगों में वही पलेगी, वैसे तो जलती रोज़ वो…

मेरी कलम से – डा० क्षमा कौशिक

प्रातः नमन –  फले ललित यह कामना, सुख बरसे चहुँ ओर, सिंदूरी सूरज उगे, मंगल मय हो भोर। पंछी वंदन कर उड़ें, कोयल मंगल गीत। राम सदा चित में बसें,…

नागलोई रिटर्न्स (टेटू बनाम नाँगलोई) – भूपेन्द्र राघव

शीत सरकते माह में.. करने दिल्ली के सैर चले.. टोंट बँधी बर्फीली हवा से.. करके हिम्मत, खैर चले.. गधे के सर से सींग सरीखा. आसमान बिन सूरज के.. हालांकि इस…

सर्दी की धूप जैसे तुम – रुचि मित्तल

कोई शोर नहीं, कोई जल्दबाज़ी नहीं बस एक धीमी, लगातार मौजूदगी जैसे सूरज की किरणें बिना पूछे, बिना शर्त चुपचाप सब कुछ छू लेती हैं तुम दूर होकर भी इतने…

बसंत पंचमी एवं गणतंत्र दिवस पर मकस कहानिका द्वारा आभासी अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन आयोजित

vivratidarpan.com – मकस कहानिका यूपी अध्याय द्वारा आयोजित बसंत पंचमी एवं गणतंत्र दिवस आभासी अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन का शुभारंभ अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। यह भव्य साहित्यिक आयोजन 25…