कांपेला बदनवा (भोजपुरी) – श्याम कुंवर भारती

रतिया जगवले मोर हो सजनवा, थर थर कांपेला जोर हो बदनवा।   सुनी के सजना के बतिया , उड़ल मोर निंदिया रतिया। ढर-ढर बहे लोर हो नयनवा, थर-थर कांपेला मोर…

काम होते गए ख़ुशी मिलती गई – पीयूष गोयल

vivratidarpan.com – एक कस्बें में एक  ग़रीब परिवार अपने इकलौते बेटे के साथ रहता था, उनकी पंसारी की एक छोटी सी दुकान थी.बेटा उनकी शादी के १५ साल बाद हुआ,…

झंकार – सविता सिंह

नीरव जीवन की स्मृतियों की राख तले नयी आहट से स्पंदित साँसे मौन को करती झंकृत। बंद पड़ी वीणा के तार, छूने से फिर झंकृत हुए, मुरझाए उपवन के मन…

प्ररेणाओं का गुलदस्ता, चिंतन और मनन कराती कविताओं का संग्रह

vivratidarpan.com – कवि सुधीर श्रीवास्तव का काव्य-संग्रह “ज़िंदगी है… कट ही जाएगी” आधुनिक हिंदी कविता की उस परंपरा को आगे बढ़ाता है जिसमें जीवन, समाज और अध्यात्म एक साथ चलते…

टैबलेट मेरा दोस्त – डॉ. सत्यवान सौरभ

टैबलेट मेरा प्यारा दोस्त, सिखाता मुझे हर रोज़ कुछ खास। खेल-खेल में ज्ञान बढ़ाता, दुनिया का नक्शा दिखलाता।   स्क्रीन पर चमकते रंग-बिरंगे, वीडियो, किताबें और गाने। पर मम्मी कहती…

छंद छटा (बेटियां) – जसवीर सिंह हलधर

रूढ़ियों की बेड़ियों को, तोड़ ताड़ आगे बढ़ीं, सरहदों पे टैंक भी चलाने लगीं बेटियां । कार, बस, ट्रेन की तो, छोटी मोटी बात अब, चांद और मंगल पे जाने…

चौपाई छंद – मणि अग्रवाल

माँ वाणी की महिमा गाऊँ। दर पर प्रतिदिन शीश झुकाऊँ।। सच्चे मन से है अभिनंदन। स्वीकारो माँ मेरा वंदन।।   श्वेत वसन तन पर हैं शोभित। कंकण कुण्डल करते मोहित।।…

इतिहास रचने आई हो – ममता प्रीति श्रीवास्तव

नारी तू कितनी अतुलनीय फिर भी न सराही जाती है, सर्व गुणों की खान हो तुम फिर भी ठुकराई जाती हो। पर अब…….. बदल रहा ये देश समूचा,बदल रहा इतिहास,…

ग़ज़ल – कविता बिष्ट

दो घड़ी हम साथ बैठे मुस्कराने के लिए, आ गई इल्ज़ाम दुनिया क्यों लगाने के लिए।   आपकी आँखें हैं मेरी ख़्वाबगाहें आजकल, और पलकें शामियाना सर छुपाने के लिए।…

जो भी हुआ, अच्छा हुआ – गुरुदीन वर्मा

जो भी हुआ, अच्छा हुआ, तुमसे या मुझसे या जग से हुआ। अब याद उसको तुम मत दिलाओ, कल जो हमारे संग हुआ।। जो भी हुआ, अच्छा हुआ,———————।।   अच्छा…