अंक में समेट लें प्रभा ह्रदय पुकारता।
प्रफुल्लता प्रकाश दे, प्रणम्य यह उदारता।
दिग दिगंत दिव्य सूर्य की छटा समान है।
दीन को महंत को सहर्ष ओज दान है।
प्रेम आप दें न दें, पुनः पुनःपधारता।
अंक में समेट लें प्रभा ह्रदय पुकारता।
हर कली खिला गई, कला प्रभा अतुल्य है।
कांति ओस की लिए, हरीतिमा अमूल्य है।
खग गगन विहार में, निमग्न मोर नाचता।
अंक में समेट लें प्रभा हृदय पुकारता।
धन्य-धन्य हो धरा, अनेक धन्यवाद दी।
अन्न धूप से बना सहायता किसान की।
हर्ष दे परोपकार, सीख सूर्य बाँचता।
अंक में समेट लें, प्रभा ह्रदय पुकारता।
अंधकार-भित्ति चित्त सूर्य तेज तोड़ता।
ईश के प्रभाव से प्रभात तंतु जोड़ता।
नित्य यह हृदय निहित हरे समस्त रुग्णता।
अंक में समेट लें प्रभा ह्रदय पुकारता।
-शिप्रा सैनी मौर्या, जमशेदपुर
