अति पावन प्रयाग नगरी में, लगे कचहरी शंकर की।
यहाँ शिवकुटी के मन्दिर में, पूजा हो भद्रंकर की।
न्यायाधीश बनते हरि-शंकर, पंचशतक शिवलिंग यहाँ,
पापकर्म को जो स्वीकारे, क्षमा मिले अभयंकर की।
नागवासुकी, मनकामेश्वर, मंदिर परम सुपावन हैं।
दरशमात्र ही भोले के, सारे पाप नशावन हैं।
यमुना तीरे मनकामेश्वर, सकल कामना पूर्ण करें,
वासुकि और शंभु के दर्शन, लगते अति मनभावन हैं।
– कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश
