भारत एक कृषि प्रधान देश है – अश्विनी कुमार दुबे

vivratidarpan.com – हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है। यह मैंने आज सोचा, जब मैं तीस रुपए किलो के भाव से गेहूं खरीद कर लाया। हमारे नेता बहुत दिनों से इस विषय पर सोच रहे हैं, उसी का परिणाम है कि आज हमें तीस रुपए किलो के भाव से गेहूं खरीदना पड़ रहा है।
खुशी की बात है कि कृषि प्रधान देश में कोई कृषि नीति नहीं है,दरअसल हमारी नीति है कि किसी भी चीज के यदि एक बार भाव बढ़ गए तो बढ़ गए, फिर भाव नीचे नहीं उतरने देना है। भाव गिरने से बाजार में इज्जत खराब हो जाती है। बढ़े हुए दामों को स्थिर रखने या फिर और बढ़ाने के लिए हम सदा प्रयासरत रहते हैं। यह प्रगति है। देश का इसी नीति से भला हो रहा है।
अखण्ड भारत के गीत गाते हम नहीं अघाते परन्तु विभिन्न राज्यों में हो रहे कई प्रकार के उत्पादन और उसके वितरण के लिए हमारी नीतियां बहुत अलग-अलग हैं। वितरण की वे नीतियां, परिवहन के बढ़े-चढ़े दाम और राज्यों की अपनी क्षेत्रीय भावनाओं के कारण कहीं गन्ने की फसल जला दी जाती है और कहीं पचास रुपए में एक गन्ना मिलता है।
नेताओं को आजकल कुछ खरीदने और बेचने में बड़ा मजा आ रहा है। शुरू-शुरू में एक शब्द बहुत चलता था – चंदा। चुनाव के लिए चंदा, अधिवेशन के लिए चंदा, समाज कल्याण के लिए चंदा, इसके लिए चंदा उसके लिए चंदा…। अब यह शब्द बहुत घिस गया है। आजकल जिस शब्द का चलन है, वह है कमीशन, पार्टी फंड के लिए कमीशन। नौकरशाहों के लिए कमीशन। दूसरों के लिए कमीशन। अपने लिए कमीशन…। कमीशन के लिए जुगाड़ चालू आहे। हर नेता, नौकरशाह और दलाल इसी जुगाड़ में लगा हुआ है कि जैसे भी हो कुछ ऐसा करो, जिसमें कमीशन हो। कमीशन है तो जीवन सुखी है। बिन कमीशन है सब सून। भैया जी की पत्नी मंदिर में प्रार्थना करती है – प्रभु कष्ट हरो सबके। प्रभु तुम तो अन्तर्यामी हो, सब भीतर की बात जानते हो। प्रभु, कृपा बनाए रखना। आजकल सीबीआई और ईडी वालों का बड़ा खतरा है। इनकी कुदृष्टि से उन्हें बचाते रहना प्रभु। परदेश से उनके लौटते ही कुशल क्षेम पूछ कर, आपको सवा पांच रुपए का प्रसाद मैं जरूर चढ़ाऊंगी। जय हो प्रभु।
पिछले दिनों देश में गेहूं, धान और तिलहन का पर्याप्त स्टाक था। देश में विदेशी मुद्रा का संकट सदा बना रहता है। देश में गरीबी है, भुखमरी है और बेरोजगारी है। परन्तु हमें सबसे पहले विदेशी मुद्रा के संकट से निपटना है। सिर्फ पर्यटन के भरोसे यह संकट कैसे दूर होगा। ताजमहल, अजंता-एलोरा और कुतुबमीनार से तो विदेशी मुद्रा का संकट दूर नहीं हो सकता। इसके लिए निर्यात जरूरी है। हम नई मिसाइलें बनाने और हीरा खोदने की विदेशी तकनीक खरीदते हैं तथा गेहूं, धान, शक्कर और बढ़िया चाय की पत्ती, विदेशों को बेच देते हैं।
इधर कुछ वर्षों में विदेशों से खूब खरीदी हुई। हमारा भारतीय बाजार विदेशी सामानों से पट गया। संचार के क्षेत्र में जो क्रांति हुई, उसके पीछे इसी विदेशी खरीद का योगदान है। हां, देश के कुछ महानगरों में किसी के दस-बीस बड़े बंगले बन गए। कुछ करोड़ रुपए सूटकेसों में सुरक्षित पाए गए और कुछ परम स्नेही मित्रों का उद्धार हो गया। पर आप जमीन से उठकर सेटेलाइट तक पहुंच गए, यह उपलब्धि किसी को क्यों दिखाई नहीं देती।
टीवी पर दो सौ तीन सौ चैनल जरूरी हैं परन्तु गेहूं एवं अन्य खाद्यान्नों की कोई जरूरत नहीं है। बहुत स्टाक है, इनका हमारे पास। विदेशों से लगातार कई वर्षों तक सामान खरीदते रहने के कारण देश ने बहुत प्रगति की। अब निर्यात की बारी है। सबसे पहले हमारा ध्यान खाद्यान्न भंडारों की ओर गया। हम धार्मिक लोग हैं। धर्म प्राण देश है यह। हमारे महापुरुषों ने कहा कि खुद भले ही भूखे सो जाओ परंतु पड़ोसी को रोटी जरूर खिलाओ। बहुत दिनों बाद हमने इस नीति का पालन किया। अर्थात् गेहूं के भंडार विदेशों को निर्यात कर दिए। अब धान, तिलहन और शक्कर के विदेशी भाव तय किए जा रहे हैं। देश में विदेशी मुद्रा का संकट है, इसे दूर करना हमारा परम कर्तव्य है। इस संकट को दूर करते-करते विदेशी बैंक में कुछ नए खाते और खुल जाएं तो उसे अन्यथा नहीं लेना चाहिए। हर उपलब्धि के साथ कुछ न कुछ विसंगतियां जुड़ी रहती हैं। अब इन छोटी-छोटी बातों में सीबीआई,ईडी और न्यायपालिका उलझी रहेगी तो हो गया फिर देश का उद्धार। गेहूं भारतीय बाजार से गायब हो। चावल के भाव आसमान छूने लगे। दाल खाना आम आदमी के लिए मुश्किल हो जाए और तिलहन के अभाव में खाद्य तेलों के भाव बहुत बढ़ जाएं, तब खाद्यान्नों का निर्यात देश की तरक्की के लिए बहुत जरूरी है।
हमारा देश, एक कृषि प्रधान देश है, जहां कृषि को छोड़कर शेष सभी विषयों पर खूब ध्यान दिया जाता है। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश की कृषि योग्य भूमि में दो-तिहाई से ज्यादा भूमि सिंचाई सुविधाओं से वंचित हैं। जैसे हर साल होली, हर साल दिवाली ऐसे ही हमारे देश में कहीं न कहीं हर साल सूखा, हर साल भुखमरी।
हमारा एक सूत्रीय कार्यक्रम है, यह प्रगति है। अब इस प्रगति के लिए आयात और निर्यात बहुत जरूरी है। इसलिए हमारी प्रमुख चिंता यह है कि क्या बेचें और क्या खरीदें। हमारे सुयोग्य अफसर रात दिन इसी प्रकार की योजनाएं बनाने में कड़ी मेहनत करते हैं। पहले बहुत कुछ खरीदने की योजनाएं थीं। चाकलेट, बिस्कुट, पापड़, डिब्बा बंद भोजन से लेकर दूरदर्शन के लिए चैनलों की उन्नत टेक्नालॉजी तक हमने विदेशों से खरीद ली। इससे देश बहुत समृद्ध हुआ। अब निर्यात की बारी है। क्योंकि हमारा देश, एक कृषि प्रधान देश है, इसलिए निर्यात के लिए खाद्यान्न पदार्थों से बढ़िया चीजें और क्या हो सकती हैं। देश में गरीबी है, भुखमरी है और हमारी जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इससे हमारी कृषि नीति का कोई संबंध नहीं है। हमारी कृषि नीति निर्यात के प्रति पूरी तरह सजग है। भुखमरा होकर हमारा देश इसी प्रकार सदा कृषि प्रधान बना रहे इसके लिए हम पूरी तरह कटिबद्ध हैं। याद आती हैं ये पंक्तियां –
तमगे रोटी न बने, नारे बने न दाल।
बैनर चिपके पीठ से, पेट रहे कंगाल॥ (विभूति फीचर्स)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *