झेलता बेवज़ह क्यो भार आदमी।
कर रहा आज अपनो से प्यार आदमी।
रात दिन झेलता अब खार आदमी,
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी।
जी हजूरी करो,ओर आगे बढो,
खुद को कहता बना रौबदार आदमी।
देखकर खूबसूरत हसीना कोई,
बीच रस्ते मे करता दीदार आदमी।
आज पूजे है मूरत भगवान की,
माँगता हाथ दोनो पसार आदमी।
इश्क उल्फत मे डूबा रहा रात दिन,
अब समझता इसे तो खार आदमी।
दिख रही आज फैली सियासत बड़ी,
हो गया आज तो खाकसार आदमी।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़
