आज…
घर की दीवारों ने
मौन होकर
माँ की साँसों को सुना है
चूल्हे की आँच
आज कम जली
पर दुआओं की गर्मी
हर कोने में फैली रही
मुट्ठी भर तिल
हथेली में नहीं
दिल में दबे थे
जैसे किसी डर को
चुपचाप थाम लिया गया हो
माँ ने…
आसमान की तरफ देखा
चाँद को नहीं
अपने बच्चे का कल ढूँढते हुए
भूख…
आज शरीर की नहीं थी
आज तो
चिंता ने उपवास रखा था
और जब
चाँद उगेगा
तो लगेगा
कोई संकट
थोड़ा और पीछे हट गया है
आज सकट है
आज माँ
ईश्वर से नहीं
समय से लड़ रही है।
©रुचि मित्तल, झज्जर , हरियाणा
