भादो शुक्ल चतुर्दशी, अनन्त का त्योहार,
विष्णु जी के रूप का, सबसे पावन द्वार।
अनन्त धागा हाथ में, चौदह गांठ लगाय,
जो बांधे सच्चे मन से, दुख सब मिट जाय।
पांडवों ने बाँधा था, जब था संकट काल,
श्रीकृष्ण की कृपा से, टला हर जंजाल।
गणपति की विदाई भी, आज के दिन होय,
आँखें नम होती हैं, दिल में उठे उमंग।
“अनन्तम् पुंडरीकाक्षम्” मंत्र जो गाय,
भवसागर से पार उसे, अनन्त प्रभु कराय।
हे अनन्त, हे अच्युत, हे दीनदयाल,
भक्तों पर कृपा रखना, सदा रखना ख्याल।
– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा, पटना, बिहार
