चांदनी
आज भी वैसे ही बरसती है
घर , आंगन, दलान
दुआर- मोहार
सब शीतल
करती है
सबके चेहरे पर
सुकून
और मुस्कान
दिखती है
घर की
बहू – बेटियां
खिलखिला कर
हंसती हैं
मैं देखता हूँ
बेटे
भी थोड़ा चुहलबाजियां
करते हैं
बच्चे
चांद को देखकर
खुश होते है
और तो और
एक
दुधमुंहा पोता है
जिसे उसकी दादी
बार बार उंगली दिखाकर
चांद को
चंदा मामा की लोरियां भी
सुनाती है।
कभी कभी
सोचता हूँ
कैसे खुद को
इतना संयमित कर लेती है
वो
क्या
मुझसे पहले
उसके जीवन में
कोई और नही रहा होगा
जरूर होगा
मैं मान ही
नही सकता
कि कोई ना रहा हो
जवानी होती ही
ऐसी है
कि
हर किसी के
जीवन में कोई ना कोई
होता है
वो बात और
है कि
सफर लम्बा नही होता
पर
एक बात है
जो
जगह दिल में
वो बना जाता हैं
वो कोई नही।
कुछ
घर की मर्यादा
कुछ समाज का डर
और
कुछ …….
कुल मिला के
हमें
वही करना पड़ता है
जो
मां -बाप का फैसला होता है।
और वही से हमारे जीवन की नई
शुरुआत होती है।
जो
मरते दम तक
चलती है
हमने देखा
वक्त के साथ
पत्नी प्रेम
शारीरिक से
शुरु होकर मानसिक और
अंतत: भावों पर आके कैसे ठहर
जाता है।
कभी-कभी
लगता है
यही स्थाई है
जैसा
कि
मैं अपनी पत्नी में महसूस कर
पा रहा हूँ।
वो
अब पूर्णत:
मुझमें सिमट गई है।
मैं ही हूँ
आज भी
उस प्रेम में
भटक रहा
जो मुझे
मिला ही नही
पुरुष हूँ ना
यही प्रवृति तो हमें
स्त्री से अलग करती है
पत्नी कितनी भी समर्पित हो
जाये
पर
हम अपने भीतर दबी
प्रेमिका के लिए
वक्त बेवख्त तड़प ही
उठते हैं ।
तभी तो
देखो ना
आज सब मस्त व्यस्त और खुश
हैं
शरद पूर्णिमा की
शीतल चांदनी में
भीग रहे।
और
मेरा मन
उसकी याद में
तप रहा
ऐसा लग रहा
जैसे –
ये चांदनी
मेरे तन और मन
को सर्प की तरह डस
रही।
एक अजीब सी
झटपटाहट महसूस हो रही।
सच कहूँ तो
याद तो
हमेशा आती है
पर
ये शरद पूर्णिमा जब जब
आती है
मेरे प्रेम की चिंगारी को
हवा देकर
तपिश को बढ़ा
जाती है।
क्योंकि
यही वो
प्रथम रात्रि थी
जिसमें
हमारा प्रेम परवान तो चढ़ा
पर
अफ़सोस की
पराकाष्ठा को
ना छू सका था।
और
अधूरे प्रेम के साथ
उम्र भर
जीना पड़ा
हमको।
उम्र भर जीना
पड़ा हमको।
– कंचन श्रीवास्तव (आरज़ू)
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
