माता–पिता की डाँट – अमित कुमार

माता–पिता की डाँट खाए बिना,

पत्थर भी प्रतिमा नहीं बन पाता।

छेनी–हथौड़े की चोट सहे बिन,

उसमें भगवान कहाँ उतर पाता।

हर चोट उसे आकार देती है,

हर पीड़ा पहचान बनाती है।

जो सह लेता है तप की अग्नि,

वही जीवन में दीप जलाता है।

डाँट में छिपा होता है स्नेह,

कठोर शब्दों में ममता रहती।

ऊपर से चाहे लगे कड़वा,

भीतर अमृत सी धारा बहती।

जिसे समझ आ जाए ये सच,

वो भाग्य को अपना मान लेता।

माँ-बाप की सीखों के आगे,

सारा जग सम्मान दे देता।

इसलिए जो डाँट मिले घर से,

उसे तिरस्कार न समझो तुम।

वही बनाएगी एक दिन तुमको,

जीवन की सच्ची, सुंदर प्रतिमुम।

– अमित कुमार बिजनौरी, बिजनौर, उत्तर प्रदेश

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