( 1 ) बनें राम
मारके मन रावण..,
हो सार्थक तभी ये जीवन !!
( 2 ) करें अंत
छिपे अंतस विकार..,
होए प्रकट तभी राम भीतर !!
( 3 ) दस इंद्रियाँ
बनीं सिर रावण..,
हो इनके ऊपर हमारा नियंत्रण !!
( 4 ) रावण मारि
तन दशहरा जीता..,
बाह्य जगत क्यूँ रोता फिरता !!
( 5 ) सच्ची शांति
खोज सीता की..,
स्वयं राम की राम से होती !!
( 6 ) आतम राम
बसे घट तेरे..,
क्यूँ मारे भटके जग के फेरे !!
( 7 ) खुद को समझ
समझ आएगा संसार..,
जपता चल तू सियाराम बारंबार !!
– सुनील गुप्ता
जयपुर, राजस्थान |
