प्रभाती वंदन – डॉ गीता पांडेय अपराजिता

आकर्षित करता सदा,मांँ लक्ष्मी का रूप।
जिस पर करती है कृपा, महिमा दिव्य अनूप।
खुशियांँ मिले अपार है,गेह बने हैं स्वर्ग,
विचलित वह होता नहीं, छांँव रहे या धूप।।

कृपा करो हेमावती,क्षमा करो हर भूल।
शीतलता मन को मिले,लगें शूल सब फूल।
मानवता ही धर्म हो,बने कर्म पहचान,
गीता आई है शरण, विनती करो कबूल।।

जान रहा संसार है,मांँ लक्ष्मी का नाम।
जिसके घर में वास है,उसके बनते काम।
अहंकार जिसके हृदय,उसको जाती छोड़,
इसीलिए शुचि भाव से,मांँ को करो प्रणाम।।
– डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन, रायबरेली, उत्तर प्रदेश

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