vivratidarpan.com – खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर, कटना खरबूजे को ही पड़ता है। आम आदमी उसी खरबूजे की स्थिति में है। सत्ता चाहे किसी की भी हो, उत्पीड़न उसका होना ही है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की नीतियां आम आदमी की समझ से परे रहती हैं। ग्यारह दिनों की अल्प अवधि में तेल कंपनियों में पेट्रोल व डीजल के दामों में चार बार बढ़ोत्तरी करके सामान्य जन की कमर तोड़ दी है। पेट्रोल व डीजल की मूल्य वृद्धि का सीधा असर यातायात के साधनों, बाजार और आम आदमी की पारिवारिक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। आम आदमी में से भी विशेषकर निम्न मध्यम और मध्यमवर्गीय परिवारों पर, अभिजात्य वर्ग और नीति निर्माताओं को बाजार से सीधा कोई सरोकार नहीं होता।
महंगाई का बढ़ना यदा कदा नहीं अखरता,जब आय के साधनों और खर्चों के बीच समन्वय हो, लेकिन गैस के दामों में बेतहाशा वृद्धि के साथ डीजल व पेट्रोल के दामों में बार बार वृद्धि होने से आम आदमी के सम्मुख अपने अस्तित्व को बचाए रखने का संकट खड़ा हो जाता है। कहना गलत न होगा, कि पेट्रोलियम पदार्थ की बिक्री केंद्र और राज्य सरकारों की कमाई का बड़ा जरिया है। यदि ऐसा न होता , तो केंद्र व राज्य की सरकारें जनहित में टैक्स काम करके जनसाधारण को इस महंगाई संकट से निजात दिला सकती है, किन्तु ऐसा नहीं है, सड़कों पर महंगाई का विरोध करने वाले कुछ राजनीतिक दलों के नेतृत्व में चल रही राज्य सरकारों में अन्य राज्यों से अधिक टैक्स वसूली की जा रही है, जिसके चलते उन राज्यों में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम अन्य राज्यों से अधिक है। किसी भी कल्याणकारी राज्य में जनता सर्वोपरि रहती है, किन्तु आम आदमी अपनी जीवनचर्या बिना किसी अतिरिक्त व्यवधान के गतिशील रखना चाहता है, जिसके लिए आवश्यक है, कि केंद्र तथा राज्यों में स्थापित सरकारें आम आदमी की रोजमर्रा की दिनचर्या को सुलभ बनाए रखने में अपना योगदान दें। आम उपभोक्ता वस्तुओं के दामों और महंगाई को नियंत्रित रखने पर पूरा ध्यान दें, ताकि आम आदमी को महंगाई से राहत मिल सके। (विनायक फीचर्स)
