आज की सोचो कल क्या होगा किसने देखा है।
आज सुखद और सफल हो क्या हमने सोचा है।
अगर आज सुधर गया कल खुद संवर जाएगा।
आने वाली सारी आपदाओं क्या हमने सिखा है।
विकास जरूरी मगर प्रकृति दोहन कैसी मजबूरी।
खुद सुधरे क्या खींची कोई हमने लक्ष्मण रेखा है।
आ रहा है सागर का पानी हमारे घर के अंदर तक।
डूब जाएंगे सारे गाँव शहर ये सब रब ने लिखा है।
सलामत नही छोड़ा जमीन और जंगल को सबने
रोक राह नदियों लकीर तबाही खुद हमने खींचा है।
जब लोग मकां पशु न रहे क्या करेंगे विकाश का ।
चिताओं पे पका खाना स्वाद पाया हमने तीखा है।
अब न सुधरे बचेंगे नहीं हम शैलाब आने वाला है।
सबक लो नेपाल भारती ये सवाल हमने फेंका है।
– श्याम कुंवर भारती, बोकारो, झारखंड
