vivratidarpan.com -दीपावली केवल दीयों का त्योहार नहीं, यह अंधकार से प्रकाश, अभाव से पूर्णता और अशुभ से शुभ की ओर जाने का पर्व है। इसी पर्व के केंद्र में है लक्ष्मी पूजन। हमारे शास्त्रों में लक्ष्मी को केवल धन की देवी नहीं कहा गया, वे श्री हैं – शोभा, समृद्धि, आरोग्य, सद्बुद्धि और सद्गुणों की अधिष्ठात्री। इसलिए दीपावली पर जब हम लक्ष्मी का आह्वान करते हैं, तो हम केवल तिजोरी भरने की प्रार्थना नहीं करते, हम पूरे घर में पवित्रता और सकारात्मकता भरने की कामना करते हैं।
आज की भाग-दौड़ में पूजन अक्सर जल्दबाजी में हो जाता है, सामग्री भूल जाती है और विधि अधूरी रह जाती है। यदि थोड़ी तैयारी पहले से कर ली जाए, तो पूजन न केवल शास्त्रसम्मत होता है, बल्कि पूरे परिवार के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव भी बन जाता है।
पहले तैयारी, फिर पूजन – लक्ष्मी जी को सुचिता सबसे प्रिय है। पूजन से पहले घर की सफाई, पूजा स्थान की लिपाई और मन की शुद्धता तीनों जरूरी हैं।
पूजन सामग्री को दो भागों में बांट लें: – 1. मुख्य पूजन के लिए: गणेश-लक्ष्मी पाना या प्रतिमा, पूजा की चौकी, लाल या पीला वस्त्र, दो कलश (तांबे या कांसे के, न होने पर स्टील के कलश पर हल्दी का लेप कर सकते हैं), एक साबुत गोल सुपारी (गणेश जी के प्रतीक) और एक लंबी सुपारी (कलश के लिए), नारियल, हल्दी की गांठ, चांदी या प्रचलित 1 और 5 रुपये के दो सिक्के, पान के दो पत्ते, आम या अशोक के पांच पत्ते।
2. थाली और सजावट के लिए: रोली, कुंकुम, अक्षत, मेहंदी, पिसी हल्दी, मौली, चंदन, अष्टगंध, केसर, इत्र, कपूर, धूप, पंचामृत, खील-बताशे, फल-मिठाई, गुड़, साबुत धनिया, लाल-पीले-सफेद फूल, एक अखंड दीप, आरती के लिए 5 या 11 घी के दीये और घर में उजाले के लिए 15 या 23 मिट्टी के दीये।
चौकी कैसे सजाएं – यही है श्री का आसन – पूजन में पूर्व या उत्तर मुख बैठना शुभ माना गया है। दीवार पर लक्ष्मी पाना लगाएं। उसके नीचे चौकी पर अष्टगंध से अष्टदल कमल बनाएं। यह कमल ही देवी का आसन है। इस कमल पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। ठीक बीच में एक सिक्का और हल्दी की गांठ रखें। यही आपका चल कोष है। इसे साल भर तिजोरी में रखा जाता है, खर्च नहीं किया जाता। यह प्रतीक है कि लक्ष्मी घर में टिके।
अब सिक्के के पीछे गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें, ध्यान रहे लक्ष्मी जी गणेश जी के दाईं ओर रहें। सिक्के के दाईं ओर गोल सुपारी रखें। दाईं ओर अक्षत पर अखंड दीप रखें, इसमें तिल या मूंगफली का तेल डालें। यह दीप पूरी रात जलने वाला साक्षी दीप है। बांयी ओर कलश स्थापित करें। कलश में जल, लंबी सुपारी और एक सिक्का डालें, आम के पत्ते लगाकर नारियल रखें। नारियल का मुख आपकी ओर हो। कलश पर मौली बांधकर स्वस्तिक बनाएं।
शंख-घंटी के साथ पूजन का आरंभ
ॐ श्रीं श्रियै नमः के साथ पूजन शुरू करें।
परिवार सहित यह भाव करें – हम केवल धन नहीं, सुख, आरोग्य और सद्गुण मांग रहे हैं।
सबसे पहले अखंड दीप और कलश का पूजन कर पुष्प अर्पित करें। फिर इस मंत्र के साथ प्रार्थना करें:
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि!
विवादे विषादे प्रवासे प्रमादे,
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि,
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि!
अर्थ है – हे भवानी! विवाद में, विषाद में, प्रवास में, जल में, अग्नि में, पर्वत पर, शत्रुओं के बीच और वन में भी आप ही मेरी एकमात्र गति हैं, सदा मेरी रक्षा करें।
इसके बाद आचमनी से जल लेकर आत्म-शुद्धि और सामग्री-शुद्धि करें। लक्ष्मी पाना को कुछ देर एकटक निहारें और मन में भाव करें कि देवी साक्षात विराजमान हैं। पंचामृत से स्नान, मौली को वस्त्र रूप में और हल्दी लगे चावलों को आभूषण रूप में अर्पित करें।
गणेश जी को पीला, लक्ष्मी जी को लाल और सरस्वती जी को श्वेत पुष्प प्रिय हैं। अष्टगंध देवी के चारों हाथों पर लगाएं। धूप की सुगंध और घी के दीये की आभा देवी की ओर ले जाएं। फिर नैवेद्य, खील-बताशे और पान का बीड़ा अर्पित करें।
अंत में सिक्का और पुष्प लेकर ‘ॐ ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः’ मंत्र का 11 या 21 बार जाप करें। यह सिक्का गृहलक्ष्मी के आंचल में डालें।
दीयों का विज्ञान – आरती के 11 दीयों में से 1 मंदिर में, 1 रसोई में (अन्नपूर्णा के लिए), 1 तुलसी चौरे पर, 1 बैठक में, 2 मुख्य द्वार पर, 4 घर के चार कोनों में रखें और 1 दीया किसी पड़ोसी या परिचित के घर दान दें। यही तो दीपावली है – अपना घर तो रोशन हो ही, दूसरे का भी हो।
यदि 5 दीये हैं तो 1 मंदिर में, 1 रसोई में, 1 तुलसी पर और 2 मुख्य द्वार पर रखें। बाकी 15-23 मिट्टी के दीये बालकनी, मुंडेर और आंगन में रखें। आरती करें और अंत में भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।
याद रखिए, लक्ष्मी चंचल नहीं, हमारा मन चंचल है। जहां तैयारी, पवित्रता और पूरे परिवार का एक साथ बैठकर किया गया भावपूर्ण पूजन होता है, वहां लक्ष्मी स्वयं ही ठहर जाती हैं। *(विभूति फीचर्स)
