सुना सच जो दिल का जता कर चले।
बुलाती रही,शब (रात) बिता कर चले।
गुजारी हैं रातें भुला कर तुम्हें,
सो तुम हमसे मुँह भी छुपाकर चले।
मैं डूबी रही रात दिन ख्याब मे,
सच्चाई है ये तुम जलाकर चले।
तू आता हमे याद अब हर घड़ी,
भुलाऊँ मैं कैसे जुदा कर चले।
उदासी मे गुजरा जमाना मेरा,
हमे क्यो नज़र से हटा कर चले।
तपे हम भी सहरा मे जाऩा बडे,
न रोका न टोका नशा कर चले।
सताते रहे दिल हमारा बड़ा,
यूँ बातों से हमको हरा कर चले।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़
