देखा जो नूर आपका मैं तो सिहर गया,
इतनी वो खूबसूरत, गली मे ठहर गया।
रूठे हो यार तुमको, मनाना बहुत हुआ,
लम्हा हसीन था भले पल मे गुज़र गया।
कैसे सहेगा दर्द को जो मुफलिसी मे रहा,
पाने को रोजगार ही तो वो शह़र गया।
लब खूबसूरत उनके नशा मुझको अब हुआ,
ऐसा चढा खुमार के,मै सोते से डर गया।
सँवरेगा भाग्य मेरा वसीयत अगर मिले,
रहमत खुदा कि वक्त भी अच्छा गुज़र गया।
मुद्दत के बाद तुम मिले रहबर से बस दिखे,
जाने के बाद यार सन्नाटा पसर गया।
उल्फत हुई है आपसे, कैसे न संग हो,
लिखते रहे ख़तो को, मुहब्बत भर गया।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़
