क्षुब्ध पर्यावरण – श्याम कुमार भारती

तप रहा है सूरज मिले कही पेड़ो की छांव नहीं।
चिलचिलाती धूप में बचने का कोई ठाव नहीं ।

तालाब पोखर कुएं सांस आखिरी अब लेने लगे ।
मछलियों मेढक जीव जंतुओं चले कोई दांव नहीं।

ऊपर आग नीचे ताप हवाये बदन सुखाने लगी है।
उजड़ा जंगल चिड़ियों चह चह कौओं काँव नहीं ।

झरनों की कल कल ठंडी झोंके हवाओ को तरसे ।
तपती धरती पर नर्म हरी घास में पड़े पांव नहीं।

विकाश के नाम पर जंगल उजाड़ा नदिया सुखाया।
क्षुब्ध पर्यावरण नष्ट जैविक विविधता का नाम नहीं।
– श्याम कुंवर भारती , बोकारो, झारखंड

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