अनुराग से – रश्मि मृदुलिका

पत्तों से टपकते ओस बूंदों की झनक,

गीले गेसुओं से उलझे कंगन की खनक,

अलसाई आंखों में सोया एक ख्वाब तेरा,

होले- होले उतरते बैचेन खुमार की ठनक,

जब से प्रेम की निशा में रतजगे हुए हैं,

जैसे बावरी सी कोई हम राधे हुए हैं,

प्रातः नव पल्लव सा उल्लास उगता है,

वृंदावन कानन- कुंज से सांस महके हुए हैं,

लज्जा लालिमा से चहेरा दमके हुए हैं,

प्रतीक्षा का हार गले में पहने हुए है,

प्रेम बावरी को श्रृंगार कुछ और नहीं चाहिए,

अनुराग आभूषण से तन- मन सजे हुए हैं,

– रश्मि मृदुलिका, देहरादून, उत्तराखंड

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