क्यों द्रवित हुआ है अंतर्मन,
क्यों व्यथित हमारा हुआ हृदय।
क्या नेह किये थे असीमित,
क्यों किया किसी ने ये अनय?
न गरल मिले किसी मीरा को,
न नयनों से अश्रु छलके।
न छल करे कोई शकुनि सम,
न रह जाये कोई हाथ मल के।
हे माधव!! बस इतना करना,
न तोड़ सके विश्वास कभी।
जो टीस हृदय में है भरा,
वो दर्द किसी को दे न कभी।
क्षमा, दया और करुणा की,
संस्कृति पुनः जीवित होए ।
विश्वास की इस पावन वेदी पर,
न कोई अपनी निष्ठा खोए ।
– सविता सिंह ‘मीरा’, जमशेदपुर
