vivratidarpan.com – पांच राज्यों के चुनाव से निवृत्त होकर गृहमंत्री अमित शाह ने सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर ध्यान दिया और इस हेतु गठित उच्च स्तरीय समिति की बैठक बुलाई। उल्लेखनीय है कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन के अध्ययन हेतु 26 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस प्रभाकर नवलकर की अध्यक्षता में केंद्र सरकार ने समिति गठित की है, जो अपनी रिपोर्ट एक साल में केंद्र सरकार को सौंपेगी।
यह सर्वविदित है कि बांग्लादेश से बंगाल, मेघालय, त्रिपुरा, असम आदि में घुसपैठ कराने वाले तत्व संगठित रूप से काम कर रहे हैं। तभी उनके आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट भी बन जाते हैं। रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिए सीमावर्ती जिलों से पूर्वोत्तर राज्यों में प्रवेश कर रहे हैं और स्थानीय सामाजिक तथा सांस्कृतिक बदलाव कर रहे हैं।
जहाँ बांग्लादेश से सामूहिक घुसपैठ होती है, वहीं चीन सीमा और नेपाल की सीमा से इन घुसपैठियों के लिए काम करने वाले पैसे वाले और प्रभावशाली विदेशी माफियाओं, अराजक तत्वों की घुसपैठ होती है, जिन्हें हमारे यहाँ कुछ नेताओं और राजनीतिक दलों का संरक्षण मिल जाता है। ये ही लोग इन घुसपैठियों को पूरे देश में सामूहिक श्रमिकों के रूप में महानगरों में फैलाते और बसाते हैं।
अपनी सेवा के दौरान बेंगडुब्बी में पोस्टिंग के समय मैंने सिलीगुड़ी, न्यू जलपाईगुड़ी, जलपाईगुड़ी, बिनागुड़ी आदि क्षेत्रों की सड़क मार्ग से यात्रा की थी। इसमें मैंने बांग्लादेश और नेपाल की सीमा से लगे इन क्षेत्रों को देखा था। नेपाल से तो भारतीयों और नेपालियों का आना-जाना ऐसे ही है जैसे भारत के एक गाँव से दूसरे गाँव में जाना। वहाँ बाजार में नेपाली मुद्रा और भारतीय मुद्रा दोनों समान रूप से चलती हैं। वहीं बांग्लादेश की सीमा पर कुछ क्षेत्रों में तार लगे हुए थे और हमारे बीएसएफ के सैनिक भी तैनात थे। भारत और बांग्लादेश की सीमा के बीच कहीं नदियाँ, कहीं गड्ढे और कहीं छोटी-छोटी पहाड़ियाँ बनी हुई थीं। वहीं अधिकांश भाग में न तो काँटेदार तार लगे हुए थे और न ही कोई सैनिक तैनात थे। ऐसे क्षेत्रों से ज्यादातर बांग्लादेशियों का आना-जाना सामान्य बात थी। बांग्लादेशी प्रतिदिन प्रयोग होने वाली सामग्री, यथा बर्तन, साइकिल, साबुन, दाल-मसाले आदि भारत से लेकर जाते थे और बांग्लादेश में दोगुने से भी अधिक मूल्य पर बेच देते थे। पशुओं का भी आदान-प्रदान किया जाता था। भारतीय सामान ज्यादातर नावों और तख्तों के सहारे बांग्लादेश में ले जाया जाता था।
भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने का काम 1986 से चल रहा था और अधिकांश सीमावर्ती राज्यों में पूरा भी हो चुका था। परंतु बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार द्वारा तार लगाने के लिए और बीएसएफ के लिए आवश्यक जमीन न दिए जाने के कारण यह कार्य चिकन नेक यानी सिलीगुड़ी गलियारे में अटका हुआ था। अब जब बंगाल में सरकार परिवर्तन हो गया है तो नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने केंद्र सरकार को तार लगाने के लिए और बीएसएफ के लिए आवश्यक जमीन दे दी है और उस बचे हुए क्षेत्र में तार लगाने का काम शुरू हो गया है। आरोप यह भी है कि ममता सरकार नहीं चाहती थी कि भारत-बांग्लादेश से आने वाले सभी रास्तों को बंद कर दिया जाए, जिससे बांग्लादेशी गुंडों को भारत में आने में कोई परेशानी हो।
केंद्र सरकार ने पड़ोसी देशों से घुसपैठ रोकने के लिए जब सीमा से पचास किलोमीटर के दायरे में आने वाले क्षेत्रों को बीएसएफ को सौंपने का नियम बनाया, तब भी ममता सरकार और पंजाब सरकार ने केंद्र के इस आदेश का विरोध किया था।
म्यांमार में 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद हजारों चिन-कुकी मणिपुर में घुस आए थे। इसी कारण मणिपुर में मैतई समुदाय और कुकी समुदाय के बीच हिंसक संघर्ष हुआ।
केंद्र सरकार द्वारा जनसंख्या परिवर्तन की जाँच के लिए बनाई गई उच्च स्तरीय समिति के निष्कर्षों से शायद कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने आएँ। अब मांग यह भी उठ रही है कि सभी सीमावर्ती राज्यों में सरकार को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर तुरंत कार्रवाई शुरू कर देनी चाहिए।
केंद्र सरकार को इस समिति के गठन के बजाय सीमावर्ती जिलों के प्रशासन को सीधे घुसपैठियों को किसी भी तरह से सीमा पार कर बांग्लादेश, म्यांमार भेजने के आदेश देने चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका ने अवैध प्रवासी भारतीयों को हथकड़ी लगाकर भारत वापस भेजा था। इन जिलों के प्रशासन को ही स्थानीय स्तर पर इन घुसपैठियों को आर्थिक और सामाजिक संरक्षण देने वाले तत्वों की पहचान कर उन्हें जेल में डालने का दायित्व सौंपना चाहिए। सीमा पार से घुसपैठ रोकने के लिए हमें अपनी सभी सीमाओं पर काँटेदार तार, सेंसर, कैमरे आदि लगाकर रोकथाम करनी होगी और सुरक्षा बलों की नियमित गश्त और तैनाती करनी होगी। अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने की कोशिश करने वाले घुसपैठियों पर गोली चलाने की छूट भी भारतीय सुरक्षा बलों को देनी होगी।(लेखक रक्षा मंत्रालय के पूर्व उपनिदेशक हैं।) (विनायक फीचर्स)
