​ श्रीकृष्ण प्राकट्योत्सव – कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

कृष्ण बसे जब से मन में तब से दिल को कुछ और न भाता।

गोपन गोपिन भाँति बसी छवि चित्त वहीं नित दौड़ लगाता।

नैन निहार रहे दिन रात अदृश्य हुआ घनश्याम सताता।

दर्शन जो मुरलीधर दें सुख चैन तभी मन को मिल पाता।

 

मोहन की मुरली मनभावन चित्त अनेक लुभाय रही है

होंठ लगे उपजे सुर मादक वो मधु को बरसाय रही है।

गोपिन-गोप सखा सँग धेनु खगों तक को भरमाय रही है।

कृष्ण पिया बन के बँसुरी नित सौतन भांति सताय रही है।

 

मोहन माधव हैं चितचोर धरें बहु रूप सदा बहलाते।

कर्म करें फल चाह बिना यह गूढ़ रहस्य हमें सिखलाते।

मुक्ति हमें किस भाँति मिले उनके उपदेश यही बतलाते।

निश्छल प्रेम भरा जिसमें उसको मुरलीधर हैं अपनाते।

– कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश

 

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