विडंबनाओं का आइना है ‘मेरे राम सबके राम’ – डॉ पूर्णिमा पाण्डेय ‘पूर्णा’

vivratidarpan.com – ‘मेरे राम सबके राम’ पुस्तक श्री राम के बहुआयामी व्यक्तित्व उनके आदर्शों और सार्वभौमिक संदेश को सरल , सुबोध एवं भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत करती है । सुधीर श्रीवास्तव की यह कृति केवल धार्मिक आस्था का बिंब भर नहीं है, अपितु मानवीय मूल्य, नैतिकता, त्याग, मर्यादा और समरसता की प्रेरक गाथा है ।
यूनिक फील पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक राम भक्ति शाखा के संत एवं 64 ग्रन्थों के रचनाकार ब्रह्मलीन महात्मा बनादास जी महाराज एवं स्वर्गीय सोमनाथ तिवारी को समर्पण की है।
89 रचनाओं को समेटे इस संग्रह की शुरुआत मां शारदे से शुरू होकर सतगुरु चालीसा पर समाप्त हुई है 163 पृष्ठ की पुस्तक है। इस संग्रह की भाषा सरल सहज है। राम आएंगे, सहनशीलता के सागर श्री राम , अयोध्या में अयोध्याधाम, प्राण प्रतिष्ठा और राम की माया, श्री राम जी घर आएंगे, सबके राम, राम जीवन मंत्र है , मेरे राम, राम मंदिर के निर्माण का सपना साकार, राम को निज़ धाम मिल गया आदि में मर्यादा पुरुषोत्तम राम को प्रमुखता दी है। संग्रह में कविताओं के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि राम किसी एक वर्ग की सीमा में नहीं बँधे हैं, वह सबके राम हैं
संग्रह में राम के जीवन मूल्य, सिद्धांत, सत्य निष्ठा और उनके आदर्शों को बताया है।
सबके राम ..रचना में आपने लिखा .….
अब जब राम जी अपने धाम आ रहे हैं
तब पता चला कि वह तो सबके राम है।

बेटी के नाम.. पंक्तियाँ बहुत सुंदर, मर्मस्पर्शी हैं ……
बेटी के बिना कौन सा समाज बना पाओगे
जिसमें रहकर मोक्ष पाने वाला सुकून पाओगे।

सुधीर श्रीवास्तव की रचनाएं एक से बढ़कर एक है ।रचनाओं के शीर्षक की जितनी तारीफ की जाए कम है। संग्रह की रचनाएं…आधुनिकता का दंश, तृप्ति, अपना अपना अंदाज, बारात आमंत्रण, फार्मूला, किनारा, मायूसी, सद्गुरु चालीसा आदि रचनाये बहुआयामी दृष्टिकोण के साथ संजोयी गयी हैं।
विडंबनाओं, तीखे विचारों और चुभते सवालों के चितेरे यमराज मित्र की पहचान बन चुके सुधीर श्रीवास्तव का यह संग्रह ‘मेरे राम सबके राम’ शीर्षक की ओट में अपने अंदाज, स्वभाव और सृजन शैली को छिपाने का प्रयास भी नहीं है। उनके शब्दों में कहें तो ‘मैं जैसा भी हूँ, बस ऐसा ही हूँ, आड़ा-तिरछा, उबड़-खाबड़ व्यक्तिव….. जिसे छिपाने की जरूरत मुझे महसूस नहीं होती, क्योंकि मैं सिर्फ मैं नहीं यमराज मित्र भी हूँ।’ बतौर समीक्षक शायद यही उनकी सृजन क्षमता का सकारात्मक पहलू है। संग्रह की सफलता की कामना और स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना के साथ आपकी बतौर अग्रजा आपकी लेखनी के निरंतर गतिमान रहने के साथ नित नए आयामों का आधार स्तंभ बनने का आशीर्वाद सौंपती हूँ।

पुस्तक समीक्षा –

पुस्तक का नाम –   ‘मेरे राम सबके राम’

पृष्ठ –  163

समीक्षक– डॉ पूर्णिमा पाण्डेय ‘पूर्णा’, प्रयागराज

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