मिला जो मन का मीत – डॉ. बसंत श्रीवास वसंत

सूना -सूना था ह्रदय मेरा, सूना- सूना था अंतर्मन,
जैसे थका मुसाफिर ठहरा हो, सूना हो घर आँगन।
ना शब्द थे, ना अर्थ था, बस सांसों की थी संगीत,
किस्मत का दर खुल गया, मिला जो मन का मीत।।

सहसा सखी ऐसा हुआ,की बुझता दीपक जल गया,
जमा हुआ ये हिम सा मन, बनकर प्रेम पिघल गया।
अब न कोई माँग है रब से,न दुनिया से है कोई जीत,
हुई मुकम्मल ये जिंदगी, मिल गया है जो मन मीत।

न परिचय न कोई सेतु बनी, नहीं कोई संवाद किया,
जैसे हो बरसों से रिश्ता ,ऐसा दिल ने आभास किया।
बरसों पुरानी प्यास की, बरस रही ये सावन प्रीत है,
ईश्वर का दिया वरदान है, मिला जो मन का मीत है।

जैसे चंदा को चकोरी या, भौरें को मिली हो कलियाँ,
महक उठी हैं मेरे मन में,मिटाकर तम की सब गलियां।
गूँज रही है रोम-रोम में, अब तो बस अनुराग -प्रतीत,
धन्य हुआ ये जीवन मेरा, मिल गया जो मन का मीत।

समर्पित है यह जीवन अब,उनके ही पावन चरणों में,
जैसे कोई सरिता मिल जाए, सागर के ही लहरों में।
अमर प्रेम की गाथा लिखने, आए मेरे मन का मीत,
जनम-जनम का विरह टुटा, मिला जो मन का मीत।

  • डॉ. बसंत श्रीवास वसंत (नरगोड़ा)
    रामकृष्ण मिशन आश्रम नारायणपुर
    छत्तीसगढ़

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