1. मुखपृष्ठ: – पुस्तक का आवरण अत्यंत भव्य, कलात्मक एवं प्रासंगिक है। इस पर राजमहल के अंतःपुर की पृष्ठभूमि में चित्रित दृश्य में रानी कैकेयी गुलाबी वस्त्राभूषणों में गरिमामयी भाव में खड़ी हैं, जबकि नीले परिधान में लाठी के सहारे झुकी मंथरा उन्हें कुछ समझाती व मंत्रणा देती प्रतीत होती है। पीले अक्षरों में शीर्ष पर लिखा ‘मंथरा’ और नीचे श्वेत वर्ण में लेखक का नाम ‘सुधीर श्रीवास्तव’ इसके सौंदर्य को निखारता है।
2. रचनाकार: – वरिष्ठ व्यंग्यकार, बहुआयामी साहित्य-साधक एवं आत्मीय भाव से परिपूर्ण डॉ. सुधीर श्रीवास्तव जी समकालीन हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी दृष्टि मानवीय संवेदनाओं और जीवन के अंतर्द्वंद्व को सूक्ष्मता से पकड़ने में सिद्धहस्त है।
3. शुभकामनाएँ एवं आशीर्वचन: -पुस्तक के आरंभ में प्रतिष्ठित साहित्य मनीषियों और वरिष्ठ जनों के सारगर्भित उद्गार व शुभकामनाएँ दर्ज हैं, जो कृति के महत्व को रेखांकित करते हैं।
4. अनुक्रमणिका एवं संरचना: – अनुक्रमणिका के अनुसार रचनाओं का विन्यास अत्यंत सुगठित है। यह पृष्ठ-दर-पृष्ठ पाठकों को एक सुव्यवस्थित प्रवाह प्रदान करता है।
5. वर्णित विषयों का वैविध्य: – यद्यपि शीर्षक ‘मंथरा’ है, परंतु यह कृति केवल एक पौराणिक आख्यान तक सीमित नहीं है। इसमें समकालीन यथार्थ, सामाजिक विसंगतियाँ, मानवीय रिश्ते, प्रकृति, दार्शनिक चिंतन और जीवन के बहुआयामी सरोकारों का सुंदर समावेश है।
6. भाषा, भाव एवं शिल्प: – भाषा प्रवाहमयी, सहज और खड़ी बोली के स्वाभाविक सौंदर्य से दीप्त है। भाव-पक्ष में गहन संवेदना और विचार-पक्ष में चिंतनशीलता का गहरा सामंजस्य मिलता है।यह संकलन लोक-चेतना, नैतिक उत्तरदायित्व और उपेक्षित दृष्टिकोणों को स्वर देकर समाज को एक नई दृष्टि प्रदान करती है।पौराणिक संदर्भों को आधुनिक जीवन-बोध से जोड़ना और विविध विषयों को एक माला में पिरोना इस कृति का सबसे सबल पक्ष है।
7. अंततः : – समग्रतः डॉ. सुधीर श्रीवास्तव जी की यह कृति अपनी विषय-विविधता और संवेदनात्मक गहराई के कारण अत्यंत पठनीय और संग्रहणीय है। मैं श्रीमान सुधीर श्रीवास्तव जी को इस कृति के लिए अनंत बधाई एवं शुभकामनाएँ संप्रेषित करता हूँ। ईश्वर आपको सदैव स्वस्थ एवं सानंद रखें। माँ वाणी की कृपा से आपकी लेखनी सतत प्रवाहपूर्ण रहे।
पुस्तक समीक्षा –
मंथरा (काव्य-संग्रह) – सुधीर श्रीवास्तव
समीक्षक—नवल किशोर सिंह
