भरे पेट राजनेताओं का दिशाहीन आंदोलन – डॉ. सुधाकर आशावादी

vivratidarpan.com – एक समय था जब देश में कांग्रेस की सरकार थी। तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान से एक जन-आंदोलन शुरू किया। उद्देश्य था सरकारी कुशासन, बढ़ते भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ शंखनाद करना। लक्ष्य सिर्फ सरकार बदलना नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक व्यवस्था में संपूर्ण बदलाव लाना था। इसीलिए ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया गया।
उस आंदोलन के प्रणेता जयप्रकाश नारायण की कोई निजी महत्वाकांक्षा नहीं थी। वे महान स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी विचारक और सर्वोदयी नेता थे, जिन्होंने जीवन गरीब और वंचित तबके के उत्थान को समर्पित कर दिया था। उस दौर के नेता व्यक्तिगत स्वार्थ से परे राष्ट्र-चिंतक हुआ करते थे।
संपूर्ण क्रांति के नारे ने केंद्र सरकार के खिलाफ आम जनता का ध्यान खींचा। तभी इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रायबरेली से लोकसभा चुनाव को रद्द कर दिया। अदालत ने उन्हें सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी मानते हुए छह साल तक चुनाव लड़ने से रोक दिया। अपने पद पर बने रहने के लिए इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया और लोकतंत्र का गला घोंटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। परिणाम यह हुआ कि 1977 के चुनाव में कई विपक्षी दलों ने विलय कर जनता पार्टी बनाई और सत्ता में आए। वह दौर ऐसा था जब विपक्ष को सरकार घेरने के लिए जनता का नैतिक समर्थन मिलता था।
आज वैसी स्थिति नहीं है। कोई भी विपक्षी दल इतना सशक्त नहीं है कि तर्कसंगत आधार पर सत्ता को घेर सके। जिसे मुख्य विपक्षी दल कहा जाता है, वह आजादी के बाद से ही एक परिवार के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाया है। लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न यही है कि जिस पर सत्ता पर अंकुश लगाने का दायित्व है, वह स्वयं लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करने में असमर्थ है।
लोकतंत्र के उत्तम स्वास्थ्य के लिए पक्ष और विपक्ष में कांटे की टक्कर जरूरी है। भारत में ऐसा नहीं हो रहा। विपक्ष ने अपने क्रियाकलापों से खुद को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है कि उसकी विश्वसनीयता पर ही संकट है। जनमानस उसे सत्ता के विकल्प के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं है। सत्ता से हटे लोग इसी हताशा में मानसिक संतुलन खो रहे हैं। अगर ऐसा न होता तो समय-समय पर अलग-अलग रूप धारण कर सरकार के खिलाफ चलाए जाने वाले आंदोलन अराजकता की भेंट चढ़कर फ्लॉप शो साबित न होते।
वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग को लेकर चंद राजनीतिक दलों का आंदोलन भी उसी दिशाहीनता का उदाहरण है। देश में न्यायपालिका है और संवैधानिक प्रक्रिया है, जिससे व्यवस्था में सुधार की राह निकाली जा सकती है। लेकिन बिना जनाधार वाले दल न न्यायपालिका पर भरोसा कर रहे हैं और न खुद पर।
सच यह है कि ये तथाकथित नेता खुद नहीं समझ पा रहे कि अपना और अपने दल का अस्तित्व कैसे बचाएं। यही कारण है कि एक ही परिवार के लोग सड़कों पर हैं। उन्हें लगता है कि उनकी हार का मुख्य कारण चुनाव आयोग ही है, जिसने चुनाव को हिंसा, बूथ कैप्चरिंग और गुंडागर्दी से मुक्त कर स्वच्छ और अनुशासित ढंग से संपन्न कराना शुरू किया है। चुनाव आयोग ने ही उनके भरे पेट पर लात मारने का दुस्साहस किया है, इसलिए वे अपना अस्तित्व बचाने में असफल हो रहे हैं।
बहरहाल, जनसाधारण का ही नहीं, सरकार का भी कर्तव्य है कि इस प्रकार के आंदोलनों की पीठ पर हाथ रखने वाले तत्वों का पता लगाए और उन शक्तियों के षड्यंत्र का पर्दाफाश करे, जो देश की गति अवरुद्ध करने का प्रयास कर रही हैं। (विनायक फीचर्स)

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