हे गणपति हे सिद्धि विनायक,
हे बुद्धि के विधाता,
तुम हो विघ्न विनाशक जग में,
तुम्हीं सुखों के दाता।
बड़े बड़े कानों से तुम फरियादें सबकी सुनते,
अपने चारों हाथों से मनुहारें पूरी करते।
हे शिव पार्वती के सुत
हे कार्तिकेय के भ्राता,
तुम दुख दर्द मिटाते उसके,
जो भी तुमको ध्याता।
छोटी छोटी आंखें हैं लंबी है सूंढ़ तुम्हारी,
गजमुख असुरेश्वर मूषक की करते सदां सवारी।
हे लंबोदर हे इक दंता
हे ज्ञान के प्रदाता,
नहीं किसी भी बुद्धि देव का
इतना विशाल माथा।
प्रथम पूज्य तुम सुर नर मुनि के मंगल मूर्ति तुम्हारी,
रिद्धि सिद्धि के संग आरती करते हैं नर नारी।
श्रीजी गणाधिपति तुम
विश्वकर्मा के जामाता,
मातृभक्ति में प्रथम नाम बस
श्री गणेश ही आता।
-अनिल भारद्वाज,एडवोकेट, हाईकोर्ट ग्वालियर
