राह चलते देखा,
ढाबे के किनारे।
यंत्र से बना पुतला।
बार-बार नमस्ते की,
सजग मुद्रा में।
सोचा, कितना सटीक है,
इंसान का पुतला।
इंसानी समाज में।
इंसान जो बन बैठा,
बस एक पुतला।
देख रहा है पत्थर हुई
खुली आँखों से,
पुतले के लिए हिंसा।
बुझता चिराग,
किसी रोशन घर का,
दिन-दहाड़े अबला हरण।
नहीं आती कुछ शर्म,
हाँ, एक बात है,
पत्थर के पुतले के सामने,
नतमस्तक होता है,
इंसानी पुतला…
✍️ प्रदीप सहारे, नागपुर
(महाराष्ट्र )7016700769
