पितृपक्ष: पितरों को तर्पण – डॉ अनमोल कुमार

आश्विन कृष्ण का आया पखवाड़ा,
याद पितरों की दिल में समाया।

जल, तिल, कुश और श्रद्धा के फूल,
अर्पण करूँ मैं, भूला न मूल।

जिनकी गोद में खेला, जिनसे पाया नाम,
आज तर्पण से करूँ, उनका सम्मान।

न आँखों में दिखते, पर दिल में बसते हैं,
हमारे हर संस्कार में, वही तो हँसते हैं।

धरती से पितर, आशीष बरसाते हैं,
तृप्त होकर वो, मुक्ति का मार्ग पाते हैं।

श्राद्ध नहीं, ये कर्ज़ का नमन है,
पितरों के बिना, अधूरा जीवन है।

जलांजलि देकर कहता हूँ यही,
आपकी छाया में, रहे जिंदगी सही।

– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा, पटना, बिहार

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