vivratidarpan,com – विगत कुछ समय से सोशल मीडिया सस्ती लोकप्रियता पाने का ऐसा जरिया बन चुका है, जिस पर राष्ट्र-विरोधी, सनातन-विरोधी तथा जातीय विद्वेष उत्पन्न करके समाज में जहर घोलने का कार्य किया जा रहा है। यह जहर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर घोला जा रहा है।
जहर घोलने में किशोरावस्था में कदम रखने वाली कुछ ऐसी युवतियां बढ़-चढ़कर अराजकता फैला रही हैं, जिन्हें न भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और सनातन परंपराओं से सरोकार है और न ही जिनकी कोई सम्मानजनक पारिवारिक पृष्ठभूमि है। केवल लड़की होना ही उनके लिए बड़ी बात है। यदि उनकी किसी अभद्र भाषा का विरोध किया जाता है तो वे विक्टिम कार्ड खेलने में तनिक भी देर नहीं लगातीं। ऐसे में राजनीति से नकारे गए तत्व और जातीय संकीर्णता से ग्रस्त तत्व बिना सत्य को समझे उनके समर्थन में खड़े हो जाते हैं।
बहरहाल, देश ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां मानसिक गंदगी का सुनियोजित ढंग से विस्तार किया जा रहा है। आम आदमी को बरगलाकर कभी जंतर-मंतर पर समाज और राष्ट्र-विरोधी विघटनकारी प्रदर्शन किए जा रहे हैं, तो कभी देश में कहीं भी कुछ जातीय तत्व अपना राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ पूरा करने के उद्देश्य से समाज में जातीय खाई चौड़ी करने पर आमादा रहते हैं।
हद तो तब हो जाती है जब भारतीय सनातन परंपरा के विरुद्ध विषवमन करने वाले तत्वों को देश का नेता प्रतिपक्ष पूर्ण समर्थन देता है तथा कानूनी प्रक्रिया पर दबाव बनाकर समाज में वैमनस्य फैलाने वाले तत्वों के समर्थन में खड़ा हो जाता है।
विचारणीय बिंदु यह है कि क्या सोशल मीडिया पर देश के प्रधानमंत्री के विरुद्ध अभद्र भाषा का प्रयोग करने की किसी को आजादी है? क्या सनातन परंपरा के आराध्य देवी-देवताओं के विरुद्ध आपत्तिजनक वीडियो बनाने वाले तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है? क्या सड़कों पर जनभावना के प्रतिकूल आचरण करना अभिव्यक्ति की आजादी के अंतर्गत माना जा सकता है? क्या कानून एक गालीबाज को जातीय आधार पर संरक्षण देकर किसी दूसरे व्यक्ति की अभिव्यक्ति की आजादी को नकार सकता है? यदि नहीं, तो एक ही झगड़े में दोनों पक्षों के प्रति दोहरा मापदंड अपनाने का औचित्य क्या है?
एक सवाल और भी है कि क्या देश में किसी भी वयस्क या अवयस्क व्यक्ति को अभिव्यक्ति के नाम पर सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने की छूट दी जा सकती है? यदि नहीं, तो ऐसे तत्वों की धरपकड़ कर उन्हें कठोर दंड देने में विलंब क्यों किया जा रहा है? (विनायक फीचर्स)
