चुनकर तुझको ही फली – सविता सिंह

चलो ना कुछ बुन लूँ ,

और कुछ चुन ही लूँ ,

कर लूँ कुछ एकत्र,

बो दूँ खाद मिट्टी में

अब उसको यत्र तत्र।

अंकुरित होंगे जब रिश्ते,

सीचूँगी फिर नेह जल से,

सहेजूँगी भर कर अंजूरी में

ताकि वह हँस कर खिले।

अरु जब आएंगे अलि

भर लूँगी पार्श्व में,

प्रीत का मकरंद ले

वह उड़े अकाश में|

फूलों की पंखुड़ी से

फिर ज़ब बनेंगे बीज

मिलकर वह मृदा में

बनाएंगे वृहत वृक्ष।

क्रमशः चलते रहना

ही उसका स्वरूप

लहराएंगे वह फिर से

उकेरेंगे अपना रूप।

हम भी कुछ बुन लें

संग कुछ चुन ले

स्नेह लेप की मृदा से

बना लें एक वृक्ष।

फिर उसकी छाँव तले

चल सब फिर मिले,

फिर कैसी तपिश

काहे की हो धूप,

जड़ों की जमीं पे

हो पकड़ मजबूत।

-सविता सिंह मीरा,जमशेदपुर

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