रात आधी का बुरा इतिहास भी है ।
ऐक ऐसा दर्द दिल के पास भी है ।।
कौम के दो फाड़ होने की मुसीबत ।
ख़ून से हमने अदा की खूब कीमत ।।
दर्द से पहचान है वर्षों पुरानी ,
देश बँटने का हमें अहसास भी है ।।
रात आधी का बुरा इतिहास भी है ।।
रात काली थी बड़ा तूफान आया ।
एक मज़हब पर चढ़ा था प्रेत साया ।।
सत अहिंसा भूल बैठे राह अपनी ,
राजनैतिक मूल्य का परिहास भी है ।।
रात आधी का बुरा इतिहास भी है ।।
हानि इससे और ज्यादा क्या करेंगे ।
वो फिरंगी नर्क में पानी भरेंगे।।
लालची नेता न समझे चाल उनकी ,
वस्त्र खादी में गुणों का हास भी है ।।
रात आधी का बुरा इतिहास भी है ।।
एक हिस्सा भेट बटवारे चढ़ा है ।
कुछ हमारे पास कुछ उनके पड़ा है ।।
सात दसकों से सतत है जंग जारी ,
ताज ‘हलधर’ देश का वो खास भी है ।।
रात आधी बुरा इतिहास भी है ।।
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
