हूर के खजाना – श्याम कुंवर भारती

तोहार मुंह लागे चान गोरी मोरे परान लेवे के बहाना बन गइलू।

अंखियां लागे रतनार महक कचनार हूर के खजाना बन गइलू ।

 

मुस्की कटार कमर कमल के डार लचके गिरे बिजुरी के मार।

चाल हिरणी कुलांच हंसला गिरे मोतिया के दाना बन गइलू।

 

अंखियां के वार घायल दिलवा हमार संभारा गोरी अंचरा तोहार।

बोली कोयली के कुक उठे हिया हुक गीत के तराना बन गइलू ।

 

तोहरी अदा सब केहू फिदा ऋषि मुनि योगी योग भइल भंग ।

उर्वशी मेनका पानी भरे शायर के गजल शायराना बन गइलु ।

 

महक जैसे महुआ के रस टप टप टपके लेके बहे पुरवा बयार ।

गोरी भारती के भाव बुझा हमारे नैन के नजराना बन गइलू।

– श्याम कुंवर भारती (राजभर), बोकारो,झारखंड , मॉब.9955509286

 

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