अरि दल थर-थर काँप उठे थे, रण में जब हुंकार हुई,
मेवाड़ों के सिंह प्रतापी की फिर जय-जयकार हुई।
हाथों में थी तेज तलवारें, आँखों में अंगार लिए,
मातृभूमि की रक्षा हेतु, प्राणों का उपहार दिए।
घास-रोटी खाकर भी जो, शीश कभी न झुका सके,
अकबर जैसे बादशाहों को भी रण में डरा सके।
चेतक जैसा वीर अश्व जब, बिजली बनकर दौड़ा था,
हल्दीघाटी का कण-कण तब, वीरत्वों से जोड़ा था।
वन-वन भटके, कष्ट सहे पर, मातृभूमि न बेच सके,
सोने के महलों के बदले, स्वाभिमान न लेच सके।
माँ भारती का लाल वो, रणधीरों की शान था,
भारत की हर वीर गाथा में, प्रताप अमर पहचान था।
सूरज भी जिसकी कीर्ति सुन, नभ में शीश झुकाता है,
भारतवासी आज भी उनका गौरव-गान सुनाता है।
जब-जब वीरता की चर्चा इस धरती पर होती है,
महाराणा प्रताप की गाथा सबसे ऊपर होती है।
– डॉ अनमोल कुमार , झारखंड
