हँसी जो उम्मीद बन गई – अमित कुमार

सोशल मीडिया की हर रील में

एक हँसी गूंजती है —

खिलखिलाती, सच्ची,

जैसे सूखी धरती पर पहली बारिश।

वह हँसी अरुण की है…

तेलंगाना की धूप में तपे

एक गरीब घर के सपनों की है।

हाथों में किताबें होनी थीं,

पर पकड़ ली थी ट्रक की पकड़,

स्कूल की घंटी छूट गई थी,

सफ़र की धूल ही बन गई थी किस्मत की लकीर।

क्लीनर बन सड़कों पर दौड़ता रहा,

पर भीतर कहीं

एक बच्चा अब भी हँसता था।

नेहरू अन्ना ने

बस एक मज़ाक सुनाया था,

और वह मासूम ठहाका

मोबाइल में कैद हो गया —

किसे पता था,

वही हँसी उसकी तक़दीर लिख देगी।

अपलोड हुई…

और देखते ही देखते

दुनिया ने उस हँसी में

अपना सुकून खोज लिया।

पहचान मिली,

सहारा मिला,

और अरुण फिर से

स्कूल की चौखट पर लौट आया।

अब वह सिर्फ रील की हँसी नहीं,

एक सपना है —

जो कहता है

गरीबी मंज़िल नहीं,

बस एक पड़ाव है।

वह पढ़ना चाहता है,

ग्रेजुएट बनना चाहता है,

ताकि उसकी हँसी

सिर्फ मनोरंजन नहीं,

संघर्ष की जीत कहलाए।

अरुण की हँसी सिखाती है —

हालात चाहे जैसे हों,

अगर मुस्कान ज़िंदा है,

तो भविष्य भी ज़िंदा है।

– अमित कुमार बिजनौरी, बिजनौर, उत्तर प्रदेश

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