लोग समझते हैं ये घाव देता है
पर सच कहूँ
ये तो मेरे कंधे पर हाथ रखकर
चलता रहा है बरसों।
मैं अक्सर मुस्कुराती दिखती हूँ
पर मुस्कान की तहों के नीचे
कितनी ही रातों की थकानें रखी हैं मैंने।
मेरी चुनरी की ये लाल मोड़ियाँ
इनमें भी थोड़ी-थोड़ी आग है
और ज़रा-ज़रा धैर्य की तपिश।
ज़िंदगी कभी आसान नहीं थी,
पर मैंने उसे आसान दिखाया है
इस तरह…
जैसे दीपक तेज़ हवा में भी
अपनी लौ को सीने से जोड़कर रखता है।
मेरे संघर्ष ने ही मुझे सिखाया—
गिरना भी इबादत है
अगर उठना उसमें शामिल हो।
और आज
मैं अपने ही कद से हैरान हूँ
कितनी बार टूटी
कितनी बार सजी
और हर बार पहले से थोड़ी और
रौशन हो गई।
संघर्ष….
मेरी कहानी का वो किरदार है
जिसे लोग खलनायक समझते रहे
लेकिन मुझे पता था
वही मेरा सबसे सच्चा साथी है।
— सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर
