वेदने तू धन्य है री – अनुराधा पाण्डेय

सतत हर्ष में भीड़ सी इक लगी थी,

अकेला मगर आज संताप मेरा।

 

जगत रीत तो ज्ञात थी पूर्व से ही,

कभी कंटकों में न जग साथ देगा।

पता था न कोई विपद के क्षणों में

कभी भूलकर रंच संज्ञान लेगा।

मगर स्वप्न में भी न सोची कभी भी,

सुनोगे न तुम रूद्ध आलाप मेरा।

सतत हर्ष में भीड़-सी इक लगी थी,

अकेला मगर आज संताप मेरा।

 

प्रणय के सकल मंत्र मैंने पढे थे ,

लगे किन्तु मुझसे हुई चूक कोई।

नहीं दोष तुमको तनिक दे रही मैं ,

हृदय में उठी किन्तु है हूक कोई।

समझ पुण्य तुमको हृदय दे दिया था-

लगे है वही बन गया पाप मेरा।

सतत हर्ष में भीड़-सी इक लगी थी,

अकेला मगर आज संताप मेरा।

 

कथा प्रीत की छद्म तुमने गढ़ी थी ,

कभी जड़ जगत को न यह मैं बताऊँ।

कभी शब्द पावन प्रणय को घृणित कह,

असंभव अरे है इसे मैं लजाऊँ।

पृथक बात है प्रेम वरदान होता –

बना है वही किन्तु अभिशाप मेरा।

सतत हर्ष में भीड़ सी इक लगी थी।

अकेला मगर आज संताप मेरा।

– अनुराधा पाण्डेय (अनु), द्वारिका, दिल्ली

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