सडक किनारे
बनते हैं फुटपाथ।
रंग-बिरंगे,
दिखते हैं लुभावने।
मोह होता है
उन पर चलने का,
लेकिन फुर्सत किसे!!
तो दिखाई देते हैं खाली।
दौड़ती सड़क संग
आते हैं नज़र सुनसान।
सुनसान जगह पर
पड़ती है नज़र कुछ—
खोमचे, पान, सब्ज़ी
बेचने वालों की।
सजने लगती हैं
दुकानें छोटी-मोटी।
आकर सोने लगते हैं
कुछ घर-बेघर मनचले।
होते हैं फुटपाथ बदनाम।
चढ़ा देता है कोई रईस
आलीशान गाड़ी उन पर।
सिसकते हैं फिर
अपनी ही दुर्दशा पर।
और रह जाते हैं
सिर्फ नाम के फुटपाथ।
-प्रदीप सहारे, नागपुर, महाराष्ट्र
मोबाइल: 7016700769
