दर्द में भी हंस के जीना आ गया,
अब हमें भी अश्क़ पीना आ गया।
ज़ख़्म इसने था दिया हम को कभी,
जनवरी का फिर महीना आ गया।
हम को ले जाती बहा कर गर्दिशें,
रब की रहमत का सफ़ीना आ गया।
बे-सबब तोहमत वो तुझ पर मढ़ रहे,
क्यों तुझे होंठों को सीना आ गया।
जब उसे पहले-पहल देख ‘धरा’,
तब से ही ग़ज़ले पिरोना आ गया।
— त्रिशिका धरा, कानपुर, उत्तर प्रदेश
