रूप भयंकर काली का , हृद में प्रेम आगार ।
भक्तों की पुकार सुन माँ, करे सबका उद्धार॥
सप्तम दिवस पर हो रहा, माँ शक्ति का आह्वान।
शंखनाद घंटा बजता, हो रहे मंगल गान।।
अती रौद्र रूपा माँ काली, जिव्हाललन भीषणा।
रक्त नयना भौहें कराली, नादापूरित इषणा।।
रक्ताम्बर तन असि कर धारे, मुंड माला शोभिता।
भक्तों के संकट सब हारे, शत्रु लोहित लोभिता।।
प्रकटी दुर्गा माँ के तन से , विचित्र वेश भूषिता।
शरणागत वत्सल जगदंबे, दनुज दंभी रोषिता।।
चंड मुंड अंधक संघारे, महिषासुर विदारिणी,
नरकासुर बीजक संघारे, भक्तानंददायिनी।।
प्रसीद अंबिके मधु-पायिनी, जगत्रायि जगदंबके।
प्रसीद चंडिके सुख-दायिनी, जग पालक त्रियंबिके।।
– डा० क्षमा देवी, देहरादून, उत्तराखंड
