आज मिलता है कहाँ सब कुछ नसीबों से।
करनी पढती है मशक्कत आज लोगों से।
चाँद भाता आज भी अपनी अदाओ से।
खूबसूरत वो लगे हमको निगाहों से।
हो गया कितना अकेला अब शजर देखो।
आशिया ही जल गया घर के च़ऱागो से।
लौट आया देख कर मैं आईना अपना।
पूछता फिरता गुनाहों को किताबो से।
जब मिले कुदरत से,अदना खुद को समझो तुम।
ल़ह़जा अपना रख ऩऱम, सीखो अभावों से।
हाय दिल मेरा उदास सा,ढूँढे तन्हाई।
मर रहा है वेवजह गम के अज़ाबो से।
यार क्यो तुम हो फँसाते गम के मारो को।
गिर न जाना यार मेरे खुद की ऩजरो से।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़
