कभी लगता है, मैं क्या हूँ,
खुद से ही पूछूँ कौन हूँ,
रिश्तों की डोरी से उलझी ,
खुद से रही अनजान हूँ।
कई- रिश्ते, कई संबंध,
हर से निकलते अलग छंद,
हर रिश्ते को दूँ मैं सब कुछ,
फिर भी मन में क्यों कुछ द्वंद्व ।
संतान बन स्नेह लुटाऊँ,
मात-पितृ का मान बढ़ाऊँ,
सभी जिम्मेदारी ओढ़े,
सोच खुद को भूल जाऊँ।
भाई-बहन का स्नेह निराला,
हर रिश्ता जैसे इक उजाला,
हर किसी के दिल में जगह है,
हर बंधन लगता है मतवाला।
कभी कोई पहली नज़र में भाया,
मन ने चुपके से जगह बनाया,
उसके लिए भी एक कोना है,
मौन हृदय से उसे सजाया।
कभी साथी बन जीवन संवारूँ,
कभी संतति बन सपने निखारूँ,
हर भूमिका में ढलती रही
फिर भी खुद को ही निहारूँ।
भगवान ने कैसी रचना की है,
मन में अनगिन हलचल दी है,
एक ही तन में सौ भाव समाए,
जीवन को अद्भुत गति दी है।
-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर
